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बावन गढ़ी जहाँ से शासित , और तीन सो पेंसठ ग्राम। बारह कोस भूमि पर निर्णय , देने वाला दुर्ग विराम।।

ग्वालियर स्थित डबरा पिछोर की 400 साल पुरानी कहावत

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ग्वालियर से 50 किमी दूर डबरा के समीप पिछोर उप तहसील स्थित है। यह डबरा तहसील अंतर्गत आता है। हम जून 2010 से मार्च 2012 तक यहाँ तहसीलदार रहे। इस कारण पिछोर के प्रति मन मे हमेशा आकर्षण रहा है।
ग्वालियर रियासत में और बाद में 1956 तक यह तहसील मुख्यालय था। सन 1956 में तहसील डबरा स्थानांतरित हो जाने से यह कस्बा पिछड़ता गया।
इसका नाम पिछोर होने के बारे में कहा जाता है कि यहाँ केऊ नाम के गांव को दुर्ग निर्माण के समय राजा ध्रुव अंगदराज ने पहाड़ के पीछे की ओर बसाया था ।इस कारण इसका नाम पिछोर पड़ा।
यहाँ पहाड़ी पर एक विशाल दुर्ग है जिसके बारे में मान्यता है कि इसका निर्माण राजा मान सिंह द्वारा कराया गया था। सतह से लगभग 100 फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित के दुर्ग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
यद्यपि देखरेख के अभाव में यह क्षतिग्रस्त हो गया है पर जो अवशेष बचे है बे इसके निर्माताओं की कहानी कहते है। 
दुर्ग में एक स्थान हवापौर के नाम से है जो तीन ओर से खुला होने से यहाँ हमेशा हवा आती है। प्रवेश द्वार के आगे दो मंदिर और एक वली का स्थान है। 
दुर्ग में मध्य में एक सुंदर तालाब है जो दुर्ग की पेयजल ब्यबस्था का अंग है। 
दुर्ग के नीचे 2 किमी दूरी पर क्लीन्द्री ताल है जहाँ कन्हर दास महाराज की समाधि एवं मंदिर है। 
यहां का लगभग 400 वर्ष का इतिहास साहस और पराक्रम की गाथाओं से भरा पड़ा है।
कहा जाता है कि चौदहवी सदी के आरंभ में राजा भगीरथ पंजाब से केऊ गांव में आये और यहाँ पूर्व से काबिज कछवाये राजपूतों को हरा कर 50 गांवों का राज्य स्थापित किया।
भागीरथ के चार पुत्रो में बड़े पुत्र चंद्रमणि गद्दी पर बैठे ,। उन्होंने बुन्देला राजाओं को परास्त कर अपने राज्य का विस्तार किया। चंद्रमणि के इकलौते पुत्र ध्रुव अंगदराज ने दुर्ग का निर्माण आरम्भ किया और केऊ गाँव को पहाड़ के पीछे बसा कर इसका नाम पिछोर रखा। इस प्रकार केऊ गाँव पिछोर बन गया।
ध्रुव अंगदराज के पुत्र हमीरदेव पिछोर के सर्बाधिक प्रतिष्ठित शासक हुए। उन्होंने दुर्ग का निर्माण कार्य पूर्ण कराया। पिछोर नगर का परकोटा और परकोटे में भव्य द्वारों का निर्माण कराया। उन्होंने बड़ी बड़ी तोपे ढलबायीं । 
कहा जाता है कि हमीरदेव ने अपने जीवन काल मे इस दुर्ग से 30 युद्ध लड़े इसमे अपने एक पुत्र का बलिदान भी देना पड़ा। नरवर और पिछोर एक दूसरे के परम्परागत दुश्मन रहे। 
नरवर के कछवाहों ने मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की सहमति से दतिया और पिछोर (शिवपुरी) के राजाओं को साथ लेकर पिछोर पर आक्रमण कर दिया।
हमीरदेव के अस्वस्थ होने पर महारानी गंगाकुमारी ने साहस के साथ युद्ध का संचालन किया। अवसर पाकर उन्होंने अपनी बहू और अस्वस्थ हमीरदेव को गाड़ी पर चारपाई बांध कर लिटा कर दुश्मन के घेरे से सुरक्षित बाहर निकल दिया।
तीन वर्ष चले युद्ध मे अंततः पराजय के बाद महारानी गंगा कुमारी को दुर्ग से पलायन करना पड़ा। इस दुर्ग से पलायन करते समय महारानी ने अपने गर्म रक्त से हथेली रंग कर सरोवर के निकट बाली दालान में थापे लगाए। 
तब से यहाँ के लोक गीतों में यह प्रचिलित है –
“रनिया रोई राव हमीर की , मेरो छूटो नगर पिछोर”
स्वस्थ होने पर 3 वर्ष पश्चात हमीरदेव ने पुनः पिछोर पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। शाहजहाँ ने उन्हें आगरा बुलाकर सात लाख वार्षिक आमदनी बाले इलाके की सनद दी। हमीरदेव ने अपने पौरुष और पराक्रम से 365 गाँवों को अपने राज्य में मिला लिये। राज्य की रक्षा के लिए 52 गड़ियों का निर्माण कराया। उनके राज्य के बारे में कहा जाता है –

बावन गढ़ी जहाँ से शासित , और तीन सो पेंसठ ग्राम।
बारह कोस भूमि पर निर्णय , देने वाला दुर्ग विराम।।


हमीरदेव के बाद पृथ्वीपति गद्दी पर बैठे। महादजी सिंधिया से उनके निकट सम्बन्ध थे।
” हिस्ट्री ए जागीरदारान ग्वालियर स्टेट “के अनुसार मुगल बादशाह शाहआलम के संकट के दौर में गुलाम कादिर के विरोध में महादजी सिंधिया के साथ पिछोर के राजा पहाड़ सिंह भी गए थे। इस मुहिम में गुलाम कादिर पकड़ा गया और उसका वध कर दिया गया। 
पहाड़सिंह महादजी सिंधिया को दिल्ली की गद्दी पर देखना चाहते थे पर महादजी ने इसके लिए इनकार कर दिया । इससे दोनो में मनमुटाव हो गया और वे पिछोर लौट आये। बाद में पिंडारियों के विरुद्ध युद्ध मे सहयोग के कारण दोनो के सम्बन्ध फिर मधुर हो गए। पहाड़सिंह जयपुर युद्ध मे भी भाग लिया और विजय प्राप्त की। जयपुर राज्य का छीना हुआ निशान अपने साथ लाये जो पिछोर किले के बुर्ज पर फहराता रहा। पहाड़ सिंह का विवाह भरतपुर नरेश बलबंत सिंह की राजकुमारी से हुआ। जयपुर विजय उपरांत उन्होंने पुष्कर जी तीर्थ की यात्रा भी की ।  वहाँ से बे महात्मा प्रेमदास जी को अपने साथ लाये। कालान्तर में इसी गद्दी पर कन्हर दास और महात्मा मनोहरदास बैठे। यह स्थान आज भी कालिन्द्री सरोवर पर जनश्रद्धा का केंद्र है। पहाड़सिंह की मृत्यु परांत उनकी रानी चंद्र कुमारी धार्मिक भाव से सती हो गई।

प्रिया बजावत बाजने , मोहि गए थे लेन ।
आज बजावत हो चली, प्रिय को बदला देन ||

महाकवि भूषण एवं मतिराम के ज्येष्ठ भ्राता कविवर चिंतामणि द्वारा लिखित

पहाड़सिंह के बाद छत्रसिंह पिछोर की गद्दी पर बैठे। उन्होंने वोहरानपुर में अपना निवास बनाया । उन्होंने महादजी सिंधिया की रानियों को लेकर दतिया राजा से हुए सिंहोड़ा के युद्ध मे दौलतराव सिंद्धिया का साथ दिया। 
कालान्तर में सम्बन्ध खराब होने पर दौलत राव सिंधिया ने पिछोर पर आक्रमण कर दिया। एक वर्ष चले युद्ध मे सालवई के किलेदार ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया अंततः छत्र सिंह परास्त हुये। पराजय के बाद हुई संधि में उन्हें 14 गाँव गुजारे के लिए मिले तथा उनका मुख्यालय मंगरौरा गढ़ी कर दिया गया। इस प्रकार विक्रम संवत 1873 कार्तिक सुदी पड़वा तदनुसार सन 1815 ई में पिछोर से इस वंस का अधिपत्य समाप्त हो गया।

  • उक्त जानकारी आनंद मिश्र जी द्वारा लिखित दुर्ग और गढ़ियाँ किताब से ली गयी है |

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